Dark ocean

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सारी खुशियाँ 

सारी खुशियाँ बिक गई इस पैसे के बाजार में,

मैं खोटे सिक्के सा खडा रहा इस लेन देन के व्यापार में।

बिक गये दो मीठे बोल किसी मिठाई की दुकान पर,

कितने कैसली जिह्ना हो गई थोड़ी सी तकरार में।

बदन हो गया नंगा चंगा, फैशन के सरोबार में,

मन ने ओढी कितनी परतें, घृणा और विकार में।

खेल खिलौने कहीं छिप गये, बच्चे अपना बचपन भूल गये,

सिर पर बैठे चिन्ता नई, रोजमर्रा के व्यवहार में।

सारा जीवन बीते रोजी रोटी में, नींद भागे दूर अँखियों से,

रोज दिन निकले, शाम ढले बस, सुख शांति के इन्तजार में।

  इस दिवाली

ये ख्वाहिशों का दौर है, यूँ खामोश से न गुजर जाइये,

मन के दीये जलाकर, किसी का आँगन रोशन कर आइये।

कुछ तेल कच्चा पक्का सा और कुछ दीपक सोंंधी माटी के,

कुछ रूई, और बाती, किसी कुम्हार से ले आइये, 

थोडा सा ही सही चाहे, उसका त्यौहार तो मनाइये।

कुछ सामान अपने घर लेना हो, किसी सौदागर को बुलाइये,

ख्याल रखिए उसके घर का, उसका चूल्हा तो जलाइये।

वो जो घूमते हैं दिन रात, धूप में सडकों पर बदहवास से,

कुछ तो उनकी कीमत थोड़ी सी, इस बार तो चुकाइये।

कुछ बच्चे बैठेंं होगें, किसी मंदिर में, किसी चबूतरे पर,

कुछ मिठाई खिलाकर, कुछ पटाखे उनके हाथ में थमाइये,

दिवारों से सिर टिकाकर, आँखों को मूँदे, जो नाराज हैं शायद,

उस गरीब को भी, थोड़ा सा कुछ दे आइये, जरा सा हँसाइये।

आइये ये दीवाली, किसी और के लिये मनाइये…….

नारी जीवन 

बिखर गई हूँ या सँवर गई हूँ, पर कितने धागों में लिपट गई हूँ,

एक जीवन है मेरा अपना, कितने बंधनों में जकड गई हूँ।

सुलझी हूँ या उलझ गई हूँ, जब तब दायरों से निकली हूँ,

कभी उडी खुली पंतग सी, कभी माझें सी कट गई हूँ।

छलकी हूँ आँखों से कभी, कभी पलकों पे ठहर गई हूँ,

एक आसूँ बनकर कभी, किसी भी मिट्टी में मिल गई हूँ।

मूर्ति बनकर दीवारों पर गढी, चित्र सी पुस्तक में सजी,

जब भी निकली हूँ किसी चौखट सें, कितना कुछ सह गई हूँ।

तुम क्या समझोगे मानव, तुमने कब समझा है मुझे,

कितनी सीमाएं है मेरी अपनी, कितनी बेडियों से मुक्त हुई हूँ।

बह रही हूँ या ठहर गई हूँ, कितनी नावों से पार गई हूँ,

एक नदी सा जीवन मेरा, कितनी लहरों में अटक गई हूँ।

 हैं कितने मेरे रूप, स्वरूप, कितने चेहरों में उभर गई हूँ,

एक नारी हूँ, एक है जीवन, हर रिश्ते में सिमट गई हूँ..

kavitaji9219.wordpress.in

  रास्ते

ये कौन से पथ हैं, ये कौन से रास्ते हैं, 

कोई साथ नही, कोई साथी नही, पर साथ में कुछ यादें है।

मैं आबाद हूँ, मैं बर्बाद  हूँ, पर मैं हैरान भी हूँ,

किसी का कोई दोष नही, पर ये कैसी शिकायतें हैं।

मैं नही हूँ अक्स किसी का, ना कोई धुधंली सी तस्वीर हूँ,

मैं क्या हूँ, मैं कौन हूँ, बस यही मेरी फरियादें हैं।

         ‘Dust’

She came as usual, and held me tight,

My hands, my ears, my hair and my sight,

She liked my eyes, and love to lie on my specs,

She entered into my room, and made her space,

She occupied everything, everyplace of my abode,

Not a corner was left, where she was not hanged,

The curtains, the books, the light and the lamps,

She went near the window, and sat on Windowpanes,

Even the hinges and handles of the doors, she did not spare,

She touched Mom’s puff, Mol’s braid, My Mr. and his hair,

She is open too moch, and she is too much hidden,

sometimes I find her in layers of my books, and in my mind,

She enters wildly, argues violently, and sits silently,

She is very simple, she wraps everything, clean and ugly, 

She wants to be with everyone, to be beautiful and lovely,

She is ‘Dust’, she comes daily…….

Kavita Parashar####kavitaji9219.wordpress.in

एक बच्चे ने माँ से पूछा, क्या होता है सच्चा प्रेम,

क्या मिलता है यह बाजार में,या दे देता है कोई भेंट।

कैसे आता है हृदय में, कैसे समा जाता है जीवन में,

और ठहर जाता है मन में, जैसे ईश का कोई संदेश।

कुछ तो बोलो आज तुम, माँ क्या होता है सच्चा प्रेम,

तुमने कहा था

सुनो तुमने कहा था जब तुम आओगे—-

चाँद बनकर मेरे नभ पर छा जाओगे,

बूदों की बनकर सरिता मेरे आँगन में बस जाओगे,

मैं खिलूँगी फूल सूरजमुखी सा, तुम सूरज बन जाओगे,

मैं नाचूंगी किसी मोर सी, तुम मेघा से बरस जाओगे,

तुमने कहा था जब तुम मेरे साथ होगे—-

हवा में कोई खूशबू सी महकेगी,

घर आँगन में, चूल्हे चौके में खुशियाँ चहकेगीं,

ख्वाहिश के पंख सजाकर, मैं उड लूँगी तुम्हारे साथ,

कभी नगर में, कभी बाजार में, इतराई सी, बौराई सी।

तुमने कहा था कि तुम मेरे इतने घने हो—–

जितनी छाया होती है स्वपन में,

जितनी छवि होती है दर्पण में,

जितना सौंदर्य होता है यौवन में

जितनी बहती है नदी, किसी सागर में,

तुमने कितना सही कहा था, जब तुम आऐ—-

एक पल को ठहरे नही, मैं पुकारती रही, 

तुम चले गए कहीं, मैं राह ताकती रही,

कुछ देर तो ठहरते सुख, कितने दिनों के बाद आऐ थे,

सुनो एक बार तुम फिर आ जाना….।